एक लम्हा बीता लिए तेरा साथ,
बन गया फ़साना बगैर पकड़े तेरा हाथ,
लम्हे की नब्ज़ तो ज़माने और वक़्त ने कब ही की दबा दी,
अब तो बस यादें छेड़ती हैं पुराने साज़
पर यादें तू तो नहीं, तेरे होने का है सिर्फ एहसास,
और एहसास देता है यादों को नहीं सिर्फ़ तुझको आवाज़…

नमन खरे

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